Friday, 16 June 2017

जुस्तजू

बड़ी जुस्तजू थी तुम्हे देखने की
मगर हम ये कह न पाए कभी
कलियाँ खिल के कँवल हो गईं
मगर तुम ना आये मिलने कभी

कितने मौशम बदल यूँ गए,हमें बात करते हुए
कहाँ खो गए आ भी जाओ प्रिये,देख लूँ एक नजर मुस्कराते हुए।।
  
                      "मार्तंड"          
    
       ये कविता हमने अपने प्रिय मित्र श्रीमान विवेक जी के व्यक्तिगत जीवन के आधार बिंदु पर लिखा है ।
         अगाध  प्रेम! बिना मिले बिन देखे कैसे संभव है ।

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