Friday, 16 June 2017

जुस्तजू

बड़ी जुस्तजू थी तुम्हे देखने की
मगर हम ये कह न पाए कभी
कलियाँ खिल के कँवल हो गईं
मगर तुम ना आये मिलने कभी

कितने मौशम बदल यूँ गए,हमें बात करते हुए
कहाँ खो गए आ भी जाओ प्रिये,देख लूँ एक नजर मुस्कराते हुए।।
  
                      "मार्तंड"          
    
       ये कविता हमने अपने प्रिय मित्र श्रीमान विवेक जी के व्यक्तिगत जीवन के आधार बिंदु पर लिखा है ।
         अगाध  प्रेम! बिना मिले बिन देखे कैसे संभव है ।

Wednesday, 7 June 2017

शेर

उसने हंस कर कहा ये कलाम किसका है
मैने भी कह दिया ये सलाम जिसका है
आना है तो आओ  दिल मे बसा लूंगा
ये मत पूंछो ये मकान किसका है

Tuesday, 6 June 2017

शेर

इतनी डिग्रियां लेकर क्यों घूमते हो
क्या ?गर्मी लाये हो,चलो खोपचे में रख दो ।।

शेर

जो पूरे हो जाएं उसे ख्वाब नही कहते
हर तारे को आफताब नही कहते

तुम्हारे चेहरे पर गिरे गेसुओं की कसम
हर उजाले को महताब नहीं कहते

Monday, 5 June 2017

शेर

रुखसत-ए-इश्क ने दो बूँद छलकाया जहाँ
उस धरा की आम्रपाली आशिकों को चाहिए

जो बड़े खुद्दार थे वो आज घुठनों पर खड़े
प्यार ने लूटा है उनको प्यार करना चाहिए

पानी की बूँद

कभी गगन से से आती
धरती से टकराती है
टूट-टूट कर बिखर-बिखर
आपस में मिल जाती है
बूँद बूँद में प्यार है इतना
दुश्मन नही बनाती

नदियों नालों में क्रंदन करती
सागर को मिल जाती है
पथ में आये कष्टों से
कभी नहीं घबराती
बूँद बूँद में इतनी शक्ति
शैल को पिघला जाती

टकराती इठराती बलखाती
हंसती खिलखिलाती जाती
बिना रुके बिना थके
बस चलती जाती
बूंद-बूंद में इतनी शक्ति
धरा जीवंत बना जाती

बूँद बूँद में प्यार है इतना
दुश्मन नही बनाती
बस जीवों के जीवन पर
खुद को अर्पण कर जाती
बूँद बूँद.....

   मार्तण्ड
9455502007
9455080809

Tuesday, 30 May 2017

शेर

बड़ी गर्दिशों में काटे हैं हमने पिछले कई साल
आज कल सितारे भी मेरा हाल लिया करते हैं ।
बडे नाज से इतराता रहा कल चाँद मेरी हवेली पर
कैसे बताएं 'मार्तण्ड' मेरे यहाँ दरबार किया करता है।।
मार्तण्ड

शेर

निकल पड़े हैं शहजादे आज समर में
तब लौटगे जब दुश्मन पड़े होंगे कबर में ।

शेर

मेरा महकूम दिल तेरे महकमे का आदी है
गुलामगर्दिश में फिर भी रात सो न सका ।

मार्तण्ड

शेर

बड़े दिन बाद आज आ गए कैसे
दिल तो महरूम था उसे भा गए कैसे
मार्तण्ड

शेर

चेहरे पर उम्र का तकाजा कैसा
दिल अभी जवान है शहजादेजैसा

Monday, 3 April 2017

गजल

तेरे सजदे में मुझको आज भी
रहना नहीं आया
मेरे बीमार लफ्जों को कभी
कहना नहीं आया.....

हवाएँ जब भी चलती हैं
मचल जाता है दिल मेरा
तेरे रूकसार का आइना
बनना भी नहीं आया .....

मेरे असगर तू लेकर चल
मुझे आदम की महफ़िल तक
मुझे तो हूर का दीदार करना
तक नहीं आया.......

तेरी सांसों की खुसबू
से दहक जाता है दिल मेरा
खुद को रोक न पाया
तुझे सुनने यहाँ आया.....

मार्तण्ड