Saturday, 11 March 2023

नेताजी

नेता जी 

यह शब्द है सम्मान का

किसी के अहंकार का

ग़रीबों के अंधकार का

महिलाओं से व्यभिचार का 


यह शब्द है तिरस्कार का

बद-दुआओं के भंडार का 

दंभ के संसार का 

पाखंड के दरबार का 


यह शब्द है  दरबार का

चापलूसों के सरताज का

चोरों के घर-बार का 

निरंकुश के अवतार का 

     


मार्तंड


जय हिन्द


Sunday, 27 November 2022

तुम याद आने लगे

 फूल खिलने लगे भँवरें मुस्कुराने लगे

हवाओं ने अधरों को ज्यूँ छुआ तुम याद आने लगे


मेघों ने छलकाया आंसू  दिल पिघलने लगा 

एक अजीब सा नशा छाया फिर उतरने लगा…


Friday, 16 June 2017

जुस्तजू

बड़ी जुस्तजू थी तुम्हे देखने की
मगर हम ये कह न पाए कभी
कलियाँ खिल के कँवल हो गईं
मगर तुम ना आये मिलने कभी

कितने मौशम बदल यूँ गए,हमें बात करते हुए
कहाँ खो गए आ भी जाओ प्रिये,देख लूँ एक नजर मुस्कराते हुए।।
  
                      "मार्तंड"          
    
       ये कविता हमने अपने प्रिय मित्र श्रीमान विवेक जी के व्यक्तिगत जीवन के आधार बिंदु पर लिखा है ।
         अगाध  प्रेम! बिना मिले बिन देखे कैसे संभव है ।

Wednesday, 7 June 2017

शेर

उसने हंस कर कहा ये कलाम किसका है
मैने भी कह दिया ये सलाम जिसका है
आना है तो आओ  दिल मे बसा लूंगा
ये मत पूंछो ये मकान किसका है

Tuesday, 6 June 2017

शेर

इतनी डिग्रियां लेकर क्यों घूमते हो
क्या ?गर्मी लाये हो,चलो खोपचे में रख दो ।।

शेर

जो पूरे हो जाएं उसे ख्वाब नही कहते
हर तारे को आफताब नही कहते

तुम्हारे चेहरे पर गिरे गेसुओं की कसम
हर उजाले को महताब नहीं कहते

Monday, 5 June 2017

शेर

रुखसत-ए-इश्क ने दो बूँद छलकाया जहाँ
उस धरा की आम्रपाली आशिकों को चाहिए

जो बड़े खुद्दार थे वो आज घुठनों पर खड़े
प्यार ने लूटा है उनको प्यार करना चाहिए