Monday, 3 April 2017

गजल

तेरे सजदे में मुझको आज भी
रहना नहीं आया
मेरे बीमार लफ्जों को कभी
कहना नहीं आया.....

हवाएँ जब भी चलती हैं
मचल जाता है दिल मेरा
तेरे रूकसार का आइना
बनना भी नहीं आया .....

मेरे असगर तू लेकर चल
मुझे आदम की महफ़िल तक
मुझे तो हूर का दीदार करना
तक नहीं आया.......

तेरी सांसों की खुसबू
से दहक जाता है दिल मेरा
खुद को रोक न पाया
तुझे सुनने यहाँ आया.....

मार्तण्ड